उत्तराखण्डराज्य

दून पुस्तकालय में प्रख्यात कार्टूनिस्ट ई. पी. उन्नी ने ‘असहमति की कला’ पर दिया प्रेरक व्याख्यान

देहरादून। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र द्वारा शनिवार को आयोजित विशेष व्याख्यान “असहमति की कला : भारतीय कार्टून कला पर एक सजीव प्रस्तुति” में देश के सुप्रसिद्ध राजनीतिक कार्टूनिस्ट श्री ई. पी. उन्नी ने भारतीय लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कार्टून कला की भूमिका पर अत्यंत विचारोत्तेजक एवं रोचक व्याख्यान प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों, कलाकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों के स्वागत से हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अरविन्दर सिंह ने ई. पी. उन्नी का परिचय देते हुए उनके चार दशक से अधिक लंबे पत्रकारिता एवं कार्टून कला के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उन्नी के कार्टून केवल हास्य-व्यंग्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे लोकतंत्र की नब्ज़ को समझने और समाज के समक्ष गंभीर प्रश्न रखने का भी एक प्रभावी माध्यम रहते हैं।

अपने चित्रात्मक व्याख्यान में ई. पी. उन्नी ने कहा कि लोकतंत्र में असहमति कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने भारतीय कार्टून कला के इतिहास, उसके विकास, स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर समकालीन भारत तक की यात्रा तथा बदलते मीडिया परिदृश्य में कार्टून की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि एक प्रभावशाली कार्टून कम शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता रखता है और समाज को सोचने के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने अपने जीवन के अनेक रोचक अनुभव भी साझा किए तथा अपने चर्चित कार्टूनों के माध्यम से व्यंग्य की अभिव्यक्ति शक्ति को भी उजागर किया।

व्याख्यान के दौरान उपस्थित प्रतिभागियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, डिजिटल मीडिया के दौर में कार्टून कला की चुनौतियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रभाव तथा लोकतांत्रिक संवाद में व्यंग्य की भूमिका से जुड़े प्रश्न भी पूछे, जिनका ई. पी. उन्नी ने विस्तार से उत्तर दिया। यह प्रश्नोत्तर सत्र अत्यंत जीवंत और ज्ञानवर्धक रहा।

कार्यक्रम में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के चन्द्रशेखर तिवारी, डी.के. पाण्डे, सुंदर बिष्ट, विजय कुमार भट्ट, हिमांशु आहूजा, डॉ. सुशील उपाध्याय, ज्ञानेंद्र कुमार,आलोक बी.लाल, समदर्शी बड्थ्वाल, अरविन्द शेखर,नादिर बिल्मोरिया, इरा चौहान, जगदीश बाबला, दिनेश शर्मा व सदस्य गण,शिक्षक, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी और नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने इस व्याख्यान को समकालीन समय की आवश्यकता बताते हुए इसकी सराहना की।

प्रारभ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से ई. पी. उन्नी तथा अरविन्दर सिंह का स्वागत तथा अंत में आभार व्यक्त किया गया। उपस्थित वक्ताओं ने इस कार्यक्रम को सराहा और माना कि ऐसे संवाद समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों, विचारों की विविधता तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उपस्थित प्रतिभागियों ने इस प्रकार के कार्यक्रमों का नियमित आयोजन किए जाने की अपेक्षा भी व्यक्त की।

यह व्याख्यान दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की उस सतत् परंपरा की नियमित श्रृंखला है जिसके अंतर्गत साहित्य, संस्कृति, इतिहास, पत्रकारिता, पर्यावरण और समसामयिक विषयों पर राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर जनसामान्य के साथ सार्थक संवाद स्थापित किया जाता है। कार्यक्रम का सफल आयोजन संस्थान के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा।

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