उत्तराखण्डराज्य

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में “एक लड़की की कहानी” नाटक और राजस्थान की पारंपरिक धागे वाली कठपुतली ने छोड़ी गहरी छाप

Dehradun, 31 july 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र एवं आसरा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित रंगकर्मी एवं लेखिका त्रिपुरारी शर्मा की स्मृति को समर्पित दो विशेष प्रस्तुतियों का आयोजन दून पुस्तकालय सभागार में किया गया। कार्यक्रम में एक ओर सामाजिक सरोकारों पर आधारित नाटक “एक लड़की की कहानी” का प्रभावशाली मंचन हुआ, वहीं दूसरी ओर प्रसिद्ध लोक कलाकार रामलाल भट्ट ने राजस्थान की पारंपरिक धागे वाली कठपुतली कला का जीवंत प्रदर्शन प्रस्तुत कर दर्शकों को लोकसंस्कृति की समृद्ध विरासत से परिचित कराया।

कार्यक्रम का शुभारंभ त्रिपुरारी शर्मा के रंगमंच और बाल नाट्य के क्षेत्र में दिए गए उल्लेखनीय योगदान को स्मरण करते हुए किया गया। उनके रचनात्मक व्यक्तित्व और समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टि को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनकी रचनाएँ आज भी समानता, मानवीय मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देती हैं।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण “एक लड़की की कहानी” नाटक रहा, जिसका मंचन आसरा ट्रस्ट के बच्चों ने अत्यंत सहज, प्रभावशाली और संवेदनशील अभिनय के साथ किया। नाटक में जन्म से लेकर शिक्षा, खेल, स्वतंत्रता, निर्णय लेने के अधिकार और जीवन के अवसरों तक लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया। विशेष रूप से यह दिखाया गया कि सामाजिक असमानता केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है, बल्कि घर की बड़ी महिलाएँ भी परंपरागत सोच के प्रभाव में अनजाने में इस भेदभाव को आगे बढ़ाती रहती हैं। नाटक ने समाज के उस दोहरे चरित्र को भी उजागर किया, जहाँ सार्वजनिक मंचों पर बेटियों के सम्मान और समान अधिकारों की बातें की जाती हैं, जबकि व्यवहार में उन्हें बराबरी का अवसर नहीं दिया जाता। कलाकारों के सशक्त अभिनय और प्रभावी संवादों ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया तथा उन्हें आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।

इसके उपरांत वरिष्ठ लोक कलाकार रामलाल भट्ट ने राजस्थान की पारंपरिक धागे वाली कठपुतली कला का मनोहारी प्रदर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने अमर सिंह राठौड़ की प्रसिद्ध लोककथा से जुड़े पात्रों और विभिन्न पारंपरिक कठपुतलियों के माध्यम से इस प्राचीन लोककला की विशिष्टता, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तथा कलात्मक सौंदर्य का जीवंत परिचय कराया। अपनी प्रस्तुति के दौरान उन्होंने बताया कि कठपुतली केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकइतिहास, लोकस्मृति और सांस्कृतिक परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम भी रही है। उनकी प्रस्तुति को बच्चों, युवाओं और उपस्थित कला प्रेमियों ने भरपूर सराहा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के अध्यक्ष प्रो. बी. के. जोशी ने कहा कि भारत की लोककलाएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थान की कठपुतली कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास, लोकजीवन और सामाजिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। आगे उन्होंने कहा कि रामलाल भट्ट जैसे कलाकारों ने इस परंपरा को कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रखा है, जो नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि “एक लड़की की कहानी” जैसा नाटक समाज में व्याप्त लैंगिक असमानताओं पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समानता आधारित समाज के निर्माण का सशक्त संदेश देता है।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारीचन्द्रशेखर तिवारी ने सभागार में उपस्थित लोगों का अभिनंदन व स्वागत किया ।
रंगकर्मी शिव सिंह नयाल ने त्रिपुरारी शर्मा के रंगकर्म, बाल नाट्य और सामाजिक सरोकारों पर आधारित सृजनात्मक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहित्य, रंगमंच और लोककलाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता, संवाद और सकारात्मक परिवर्तन का वातावरण तैयार करना भी है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक विरासत और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।

इस अवसर पर पुस्तकालयाध्यक्ष डी. के. पाण्डे, जयभगवान गोयल, सुन्दर सिंह बिष्ट, त्रिपुरारी शर्मा के पुत्र कबीर, गजेन्द्र नौटियाल, देवेन्द्र कुमार, हर्ष मणि भट्ट,जगदीश सिंह महर, रंगकर्मी मदन डुकलान, जनकवि डॉ.अतुल शर्मा, जगदम्बा मैठाणी, कृष्णा नौटियाल,विजय भट्ट, मदन सिंह बिष्ट सहित अनेक साहित्यकार, लेखक, रंगकर्मी, कला प्रेमी, शिक्षाविद्, युवा, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में कलाकारों प्रति आभार प्रकट किया गया । सभागार में उपस्थित दर्शकों ने इस प्रकार के सार्थक सांस्कृतिक आयोजनों को निरंतर आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया। कुल मिलाकर यह आयोजन सामाजिक संवेदनशीलता, लोकसंस्कृति के संरक्षण और रचनात्मक अभिव्यक्ति का एक सार्थक माध्यम सिद्ध हुआ, जिसने उपस्थित सभी दर्शकों के मन पर गहन छाप छोड़ी।

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