विश्वेश्वर दत्त सकलानी ‘‘वृक्ष मानव

वृक्ष वन्दना
मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वज।
मंगलम पुण्डीरकाक्षः, मंगलाय हस्तनुहरि।।
मंगलमय हो जीवन प्राण, मंगलमय हो जन-जन का ज्ञान।
मंगलमय हो वनस्पति, मंगलमय हो वृक्ष भगवान।
मंगलमय हो वसन्धुरा, मंगलमय हो देश हमारा।
मंगल करणी गांव-गांव हंमारा, मंगल करणी हो ये जग सारा।
वृक्ष मेरे माता-पिता, वृक्ष मेरे भगवान,
वृक्ष मेरे संगी-साथी, वृक्ष मेरी संतान,
वृक्ष हो मेरा तन, वृक्ष हो मेरा मन, वृक्ष हो मेरा धन,
वृक्ष लगाकर करें हम हम धरा सम्पन्न।
मेरी माटी की देह से प्रभु जब जीवन निकल जाये,
मेरी माटी की देह में एक वृक्ष लग जाये।
छूट गई जो सेवा मुझसे, सेवा वो वृक्ष कर पावे।
मारो पत्थर, पीड़ा सहन कर लेवे,
मारो पत्थर फल दे देवे।
अपने आप सहन करे धाम, औरों को दे दे विश्राम।
ऐसा ही गुण-ज्ञान ले लेवे वृक्षों से इंसान,
ऐसा ही वरदान दे दो जगति के जन-जन को हे भगवान।
हम भूख को सहन करते हुये, भूखे को भोजन देना न भूलें,
हम प्यास को सहन करते हुये, प्यासे को पानी देना न भूलें।
संकट और दुखों को सहन करते हुये हम, सेवा का भाव न भूलें।
ऐसा ही गुण-ज्ञान ले लेवे वृक्षों से इंसान,
ऐसा ही वरदान दे दो जगति के जन-जन को हे भगवान।
वृक्ष तन काटो नहीं, वृक्ष भलो उपकार,
युग-युग से खंडो एक जगह, सबको सब कुछ दे दे होनहार।
भलो भलाई भलो है, भलो मेरो संसार।
एक दिन आवे, एक दिन जावे, दो दिन को घरबार।
वृक्ष मावन, वृक्ष वन्दना।



