उत्तराखण्डराज्य

चलो आज भी…

चलो आज भी

एक नया ख्वाब देखते है

खाली होते पहाड़ में

एक भरा पूरा गांव देखते है।

खेती, खलियानों , गोरु भैशो में

मां का हाथ बटाती जवानी देखते है।

किताबों ,अखावरो के नहीं

जीकर पहाड़ में

पहाड़ सा स्वाभिमान देखते है ।

गंगा को रोका ,हिमालय को टोका,

टूटते पर्वत और रूठे केदार को देखा

घटते ग्लेशियर और फैलते पलायन की रेखा

अबकी अपने पूर्वजों की विरासत संवारते है ।

खालो का पानी और डाडों सा बथो

दादी की सदरी और दादा टोपली

खेती में ज्ञान और संस्कृति में रिवाज

आओ ये फैशन दुनिया में देखते है ।

ढोल का साज,और पत्थर का राज

मशकी की तान और ग्राम देवता का मान,

घसयारी के गीत और लाम पर मनमीत

हकीकत की दुनिया का पहाड देखते है ।

रुकी जवानी और थमता पानी

हंसता बचपन और निरोग नारी

संतुष्ट दाना सायना,हरी भरी हो सारी

बेशक कठिन पर प्रयास कर देखते है ।

_______________rrakesh uniyal

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