उत्तराखण्डधर्मराज्य

आर्यम गुरुदेव के सानिध्य में भव्य काली पूजा संपन्न!

  • काली-कृष्ण कृपा अनुष्ठान : भगवान शंकर आश्रम
  • सहस्रों पुष्पों से हुआ दिव्य पुष्पार्चन, देश-विदेश से जुड़े 600 से अधिक लोग

मसूरी (देहरादून)। देवभूमि उत्तराखंड में स्थित मसूरी की घाटियों में भगवान शंकर आश्रय के तत्वावधान में संपन्न हुआ ‘काली कृष्ण कृपा अनुष्ठान’। काली जयंती एवं कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर यह विशिष्ट पूजा आर्यम जी महाराज के सानिध्य में संपन्न हुई। यूँ तो गूगल मीट इस पूजा से जुड़ने का माध्यम थी किंतु कुछ शिष्यजन आश्रम पहुंचकर इस अनुष्ठान में सम्मिलित हुए। परमप्रज्ञ जगद्गुरु प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार आर्यम जी महाराज ने स्पष्ट किया कि आज की तिथि इसीलिए विशेष है चूँकि माँ काली एवं भगवान श्री कृष्ण का जन्म इसी दिन हुआ था।

आर्यम जी महाराज ने देवी काली के विषय में बताते हुए कहा कि देवी काली अकाल मृत्यु की दात्री भी हैं तो उससे बचाने वाली भी वही हैं। यही कारण है कि गुरुदेव ने उन्हें ‘जीवन की संचालिका’ कहा। देवी काली दस महाविद्याओं में से एक हैं, इसके बावजूद समस्त देवियों का जन्म उन्हीं से हुआ है। जिन पर काली माँ की कृपा रहती है वे असाध्य रोगों जैसे कैंसर से भी सुरक्षित रहते हैं। महाकाली का यह महास्वरूप केवल विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि परम करुणा और सृजन का प्रतीक भी है। जब-जब संसार में अधर्म और असंतुलन बढ़ता है, माँ अपने उग्र रूप में प्रकट होकर सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित करती हैं।

वहीं दूसरी ओर भगवान श्री कृष्ण ‘पालनहार’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। आर्यम जी महाराज ने बताया कि जहाँ माँ काली संहार और मुक्ति की अधिष्ठात्री हैं, वहीं भगवान श्री कृष्ण इस सृष्टि के पालन और प्रेम के आधार हैं। गुरुदेव आर्यम ने स्पष्ट किया कि भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों के समस्त कष्टों, संकटों और विपत्तियों से रक्षा करते हैं। जो सच्चे मन से उनका स्मरण एवं आराधना करता है, उसके जीवन से भय और अभाव दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। आर्यम जी महाराज के अनुसार जब काली की शक्ति और कृष्ण की करुणा एक साथ भक्त पर बरसती है, तब जीवन में न मृत्यु का भय शेष रहता है और न ही किसी प्रकार की कमी। यही इस काली-कृष्ण कृपा अनुष्ठान का गूढ़ रहस्य है, जहाँ शक्ति और पालन का दिव्य संतुलन भक्तों को पूर्णता प्रदान करता है।

इस अनुष्ठान की सबसे विशेष बात यह रही कि गूगल मीट के माध्यम से देश-विदेश से 600 से अधिक भक्त एक ही समय पर, एक ही संकल्प से जुड़े। स्विट्ज़रलैंड, मॉरीशस, लंदन, कैनेडा ,अमेरिका ,नेपाल एवं दुबई सहित अनेक देशों में बसे शिष्यों ने अपने-अपने स्थानों से इस दिव्य पूजा में सहभागिता दी, जबकि कुछ शिष्यजन आश्रम में स्वयं उपस्थित होकर अनुष्ठान के साक्षी बने। दूरियाँ चाहे कितनी भी रहीं, समय के अंतर चाहे जैसे भी रहे, किंतु गुरुदेव के सानिध्य में सभी भक्त एक ही भक्ति-भाव के सूत्र में बंधे रहे।

ट्रस्ट की अधिशासी प्रवक्ता माँ यामिनी श्री ने बताया कि आर्यम गुरुदेव सनातन एवं वैदिक पूजा पद्धतियों के उन गूढ़ विषयों और रहस्यों को उजागर कर रहे हैं जो वर्षों से छिपे रहे। माँ काली की आराधना अत्यंत कठिन है, इसके बावजूद गुरुदेव ने उस विद्या को, उन मंत्रों को अपने शिष्यों के जीवन में सम्मिलित किया। आर्यम जी महाराज का कथन है कि सभी भक्त अपने पुरोहित स्वयं बनें। वह स्वयं परमात्मा से अपना रिश्ता स्थापित करें। धर्म के जगत में स्वावलंबी बनने की इस शिक्षा से ही असंख्य शिष्यों का जीवन रूपांतरित हो रहा है।

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