उत्तराखण्डराज्य

हिमालय दिवस : हिमालय पुकार रहा है…

हिमालय पुकार रहा है
शीश उठाए खड़ा हिमालय,
भारत का अभिमान है,
बर्फीली चादर ओढ़े देखो,
धरती का वरदान है।
युगों-युगों से अडिग खड़ा है,
सदियों का इतिहास लिए,
ऋषियों की तप-धरा सँजोए,
पावन-सा विश्वास लिए।
गंगा की निर्मल धारा में,
तेरी ही तो साँसें बसीं,
यमुना की कल-कल में तेरी,
ममता बनकर प्यास बसी।
तेरी घाटियां, तेरे जंगल,
जीवन के आधार हैं,
तेरी गोद में पलते कितने,
जीव-जगत और व्यापार हैं।
पर आज हिमालय चुप है क्यों ?
क्यों आँखों में है नमी ?
क्यों बर्फीली चोटियों पर
पहले जैसी चमक नहीं ?
धुआँ उठे जब शहरों से,
समीर हुई जब विषैली,
पेड़ों की घटती संख्या ने
धरती की साँसों को रोका ।
ताप बढ़ा तो हिम पिघली,
नदियों का संतुलन डोला,
कहीं अचानक बाढ़ उतरी,
कहीं सूखे ने मुँह है खोला।
पर्वत की छाती पर हमने
कंक्रीट के जंगल बो दिए
सड़कों की अंधी दौड़ में
कितने वन हमने खो दिए।
हमने सोचा—विकास यही है,
ऊँची इमारतें, चौड़ी राहें,
पर भूल गए उस धरती को,
जिसने दी जीवन की चाहें।
अब भी समय है, लौट चलें हम,
प्रकृति से रिश्ता जोड़ें,
एक वृक्ष नहीं—वन उगाएँ,
नदियों के घावों को धोएँ।
प्लास्टिक से पर्वत बचाएँ,
निर्मल रखें उसकी धारा,
कम हो धुआँ, बचे हरियाली,
स्वच्छ बने नभ फिर से सारा।
हिमालय केवल पत्थरों का नहीं ढ़ेर,
यह भारत की शान है,
इसके आँचल में पलता
हम सबका जीवन-प्राण है।
इसे बचाना केवल पर्वत बचाना नहीं,
अपना कल बचाना है;
हिमालय की हर बर्फीली साँस में
भारत का भविष्य बसाना है।
आओ आज प्रण लें मिलकर
न प्रकृति को घायल होने देंगे,
न जंगल यूँ उजड़ने देंगे,
न नदियों को मैला होने देंगे,
न हिमालय को रोने देंगे।
जब तक धरती, नभ और सागर,
जब तक सूरज-चाँद रहेंगे,
तब तक हिमालय की चोटियाँ
भारत का गौरव कहेंगी।
हे हिमगिरि! तेरे चरणों में
शत-शत नमन हमाराहै
तू रहे अडिग, तू रहे अमर,
तू ही “ऐ दविंदर “भारत
का उजला सितारा है।
डाॅ. दविंदर कौर होरा
इंदौर म.प्र

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