उत्तराखण्डराज्य

सावन की लठी तोड़ बरखा…

बरखा ,
सावन की लठी तोड़ बरखा
नहीं पहाड़ी मिजाज,
लगता देशी रिवाज ।
बादलों का कड़कड़ाहट,
बिजली की चमकाहट,
नहीं मेरे पहाड़ की रूणझुण,
पट्ट कुरेणी सी फटकण ।
ये मौसम का भटकाव,
पहाड़ी मनुष्य का भी बदलाव,
तब मोणका अब छतरी,
खेती पाती अब बाजी डोंखरी ।
बरखा तो आ गई,
यादे लौटा गई,
गांव की गोड़ार्थ में बजते
दीदा के ढोल के गीत सुना गई ।
आज की बरखा,
भौतिकता की बरखा,
चैन न पशु,
बस देशी चरखा ।
हे श्रावन के महाकाल,
पर्वत वासी ,
लौटा दो पहाड़ सा सावन,
मां सी ममता बीता बचपन ।
__________राकेश_!

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