सच्चे घर की ओर

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज
इस ज़िंदगी में हरेक इंसान की यही कोशिश होती है कि उसके पास अपना घर हो। एक पिता अपने परिवार को बढ़ाता है और अपने परिवार और बच्चों की सुरक्षा के लिए वह कार्य करता है क्योंकि वह जानता है कि उसके परिवार और संपत्ति की सुरक्षा के लिए एक घर का होना बहुत ही ज़रूरी है। जब हम कोई घर खरीदते हैं, चाहे वो हमने बनवाया हो या किराये पर लिया हो, उसको हम सुरक्षित रखना चाहते हैं।
हम सब इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि हमारा घर सुरक्षित रहे। वहाँे हम मोटी-मोटी ग्रिल लगवाते हैं, सिक्योरिटी के साधन लगवाते हैं। आजकल के जमाने में सुरक्षा अलार्म भी लगाए जाते हैं ताकि चोरों को घर में घुसने से रोका जा सके। हम सब चाहते हैं कि जहां हम रहते हैं वह जगह सुरक्षित रहे जिससे कि हमारे परिवार और संपत्ति की देखभाल और सुरक्षा हो सके।
सभी संत-महापुरुष हमें समझाते हैं कि जैसे हम चोरों से अपने घर को सुरक्षित रखना चाहते हैं, ठीक उसी प्रकार हमंे अपनी आत्मा की भी सुरक्षा करनी चाहिए। लेकिन अनजाने में हम चोरों को अपने भीतर घुसने देते हैं और अंदर आते ही वो हमारे भीतर तबाही मचा देते हैं। ये पाँच चोर हैं: काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। ये हमारे भीतर घुस चुके हैं और दिन-ब-दिन खराबी कर रहे हैं।
हम अपने घरों को तो चोरी से बचा सकते हैं परंतु क्या हम इसी तरह इन पाँच चोरों को अपने भीतर घुसने से रोक सकते हैं? चुपचाप और दबे पांव यह हमारे अंदर आकर अपना अधिकार जमा लेते हैं। जिससे हमें गुस्सा आता है, हम झूठ बोलते हैं, हम दूसरों को धोखा देते हैं और अहंकार के कारण हम कई तरह की खराबी करते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि ये चोर हमें हमारे सच्चे घर और रूहानियत से हमें दूर कर देते हैं।
रूहानी तरक्की करने के बजाय हम इन चोरों द्वारा नकारात्मक विचारों से भर जाते हैं और हमारी सच्ची दौलत, जोकि पिता-परमेश्वर से जुड़ना है, उससे हम जुड़ नहीं पाते। इस दुनिया में हमारा ध्यान इन पाँच चोरों की गतिविधियों में ही लगा रहता है। हम ध्यान-अभ्यास करना चाहते हैं तो यह चोर हमारे विचारों पर कब्जा कर लेते हैं। हम सद्गुणों को अपने जीवन में ढालना चाहते हैं, निष्काम सेवा करना चाहते हैं लेकिन यह चोर हमें ज़रूरतों और इच्छाओं के जाल में फंसाए रखते हैं और हमारे मन की शांति को भंग कर देते हैं। ऐसे हम अपने आपको असफल, असहाय और निराशाओं से घिरा हुआ पाते हैं।
ऐसी अवस्था में हमारे अंदर से एक पुकार निकलती है। जिसे हम प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना यह दर्शाती है कि हम असहाय हैं, हम कमजोरियों और गुनाहों से भरे हुए हैं और हमें अपने से अधिक ताकतवर की सहायता चाहिये। प्रार्थना बहुत प्रभावशाली होती है क्योंकि इसके ज़रिये प्रभु यह जान जाते हैं कि हमें यह महसूस हो गया है कि हम निर्बल, कमजोर और असहाय हैं, इसीलिए हमें प्रभु का साथ चाहिए। कहा जाता है कि अगर हम एक कदम प्रभु की ओर उठाते हैं तो वह सौ कदम हमारी तरफ बढ़ाते हैं। जब तक हम एक कदम प्रभु की तरफ नहीं उठाते, तब तक प्रभु हमारी मन-मर्ज़ी में कोई हस्तक्षेप नहीं करते। प्रभु तब तक हमारा इंतजार करते हैं, जब तक हम उन्हें मदद के लिए न पुकारें। प्रार्थना वह क्षण है जब हम मदद के लिए पुकार करते हैं और तब तुरंत प्रभु हमारी मदद के लिए आ जाते हैं।
इसके अलावा प्रभु को याद करने का एक और भी तरीका है जिसे हम सिमरन कहते हैं। सिमरन प्रभु के नाम का जाप है जिसे दोहराने से पाँच चोर भाग जाते हैं। जब हमें लगता है कि क्रोध का चोर हम पर हावी हो रहा है तब हमें सिमरन करना चाहिए। तब सारे क्रोधित विचार भाग जाते हैं और हम स्वयं को शांत पाते हैं। जब कभी हम देखें कि लोभ का चोर हमारे अंदर घुस रहा है तो उस समय हमें सिमरन करना चाहिए। ऐसा करने से हमारी स्वार्थी होने की इच्छा, दूसरों की मदद करने की इच्छा में बदल जाएगी। जब कभी अहंकार का चोर हम अपने भीतर पाते हैं तो हमें सिमरन करना चाहिए। ऐसा करने से हम स्वयं में नम्रता और मानवता से भरा हुआ पाएंगे।
इसी तरह यदि हम किसी ऐसे संत-महापुरुष की संगत करें, जो रूहानियत की दौलत को बांटते हांे, उनके साथ रहने से भी हम अपने मन की स्थिति को बदल सकते हैं। संत-महापुरुष फ़रमाते हैं कि हर आदमी के लिए उम्मीद है। बुरे से बुरे और पापी से पापी के लिए भी उम्मीद है। पश्चाताप करो, प्रार्थना करो और आगे पाप मत करो। महापुरुषों के प्यार भरे इस अनोखे तरीके से चोर और डाकू भी नेक इंसान में बदल जाते हैं। संतों की संगति में रहने से और ध्यान-अभ्यास के द्वारा ज्योति और श्रुति से जुड़ने से भी हम अपने मन को शांत कर सकते हैं। तो फिर हमारी आत्मा की शक्ति भंग नहीं होती।
संत महापुरुष हमें बताते हैं कि एक और तरीका है जिससे हम इन चोरों के चुंगल से बच सकते हैं। वह है किसी पूर्ण संत-महापुरुष का सत्संग। उनके सत्संगों में जाकर हम अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। यह वह समय है जब हमारा मन शांत होता है। नहीं तो हम लगातार अपनी नौकरी, धन, परिवार और रिश्तों की समस्याओं के बारे में सोचते रहते हैं। सत्संग में आकर हमारी सारी समस्याएँ दूर हो जाती हैं। यह हमारी आत्मा को अंतर्मुख करके प्रभु से जुड़ने का मौका देता है। सत्संग का माहौल बड़ा शांत और सत्गुरु की तवज्जो से भरा होता है। जिसे हम वापिस अपने साथ ले जा सकते हैं। इसके द्वारा हमारे अंतर हमेशा एक आंतरिक संपर्क बन जाता है। जहाँ से वापिस लौटकर हम उसी आनंद को फिर से पा सकते हैं। सत्संग हमें एक ऐसी ज़िंदगी दे सकता है जो प्रभु-प्रेम से भरपूर हो।
अगर हम इनमें से किसी एक को अमल में लाएंगे तो हम पाएंगे कि हमारी बहुत सी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। हम उस आनंद और मस्ती का अनुभव कर पाएंगे जो अंतर में हमारा इंतजार कर रहा है।



