उत्तराखण्डराज्य

रावण का कद बढ़ता जा रा, राम छोटे होते जा रे

रावण का कद बढ़ता जा रा, राम छोटे होते जा रे

रावण का कद बढ़ता जा रा,
राम छोटे होते जा रे।
कलयुग के मेले में देखो,
कैसे-कैसे खेल होते जा रे।

दस सिर वाला खुला घूमता,
बिना किसी डर के,
एक सिर वाले डरते फिरते,
अपने ही घर के अंदर के।

रावण अब भाषण देता है,
मंच पे माला पहन के,
राम बेचारा खड़ा है देखो,
फ़ाइल लिए, लाइन में लग के।

रावण की महिमा गाते हैं,
बड़े-बड़े ज्ञानी,
राम का नाम जो ले,
उसे कहते हैं अभिमानी।

सोने की लंका वाला अब,
सोना बेचता जा रा,
वन-वन भटके राम को देखो,
कोई नहीं पूछता जा रा।

रावण के चेले बन बैठे,
थानेदार और लीडर,
राम के बंदर भी अब तो,
मांग रहे हैं फीडर।

सच बोले तो रावण हँसे,
झूठ बोले तो वाह-वाही,
राम अगर सच बोल भी दे तो,
कहते – ये तो तबाही।

सीता की अग्नि-परीक्षा अब भी,
हर चौक पे होती,
रावण की हर अय्याशी को,
दुनिया किस्मत कह रोती।

लेखा-जोखा देखो भाई,
उल्टा सीधा हो रा,
धर्म का तराजू झुक गया,
पाप का पलड़ा भारी हो रा।

फिर भी एक आस बची है,
दीया अभी बुझा नहीं,
राम भले छोटे दिखें,
पर राम कभी मरा नहीं।

रावण का कद है कागज़ का,
फूँक से उड़ जाएगा,
राम जो दिल में जिंदा है,
वो फिर लौट के आएगा।

– स्वरचित : नवीन उनियाल

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