खिल गए बुरांस…

खिल गए बुरांस,
लौट आए घुघुती हिलांस,
उग रही कुलबुली घास,
बीत गया ह्यूदी बनबास ।
बज रहे चिड़ियों के गीत और संगीत,
भवरो के खिल रहे चेहरे,
फूलो पे डाल रहे डोरे ।
ये देखो फ्योली का रूप,
दे दिया पहाड़ को फागुनी स्वरूप,
हर शाख पर बसंती बयार,
हरियाली सज गई धार और पार ।
मां ने भी कमर बांध लिया,
गैंती कुटली को सजा लिया,
बैलों के भी सिंग तेल मल दिया,
बीज भात् का कुठार खुल गया ।
दिदा के ढोल पर चड़ रही नई पूड़,
दीदी भुलियो को ले जाएगा चैती समुड़,
राजी खुशी के लिए बजेगे चैतीनवरात्रे,
ग्राम देवता और देवी होगे जास्त्रे ।
ये पहाड़ देखो क्या खूब सज रहा,
पूरी दुनिया को तरसा रहा,
हम तुम तो विमुख हो रहे,
बहुत बगुले नजरे गाड़ रहे ।
सुंदर बहुत है सौंदर्य लाजवाब,
चाहे हम तो संसाधन बेहिसाब,
फ्योली में रूप तो बुरांस भी कम नहीं,
पहाड़ में सब है पर चाहते तुम नहीं ।
अब और आज करो स्वागत बसंत का,
उल्लास उमंग का और पहाड़ी जंत मंत का,
फूलो की खुश्बू से नव जीवन की आस
लौट आए परिंदो से घर गांव का अहसास ।
_____________राकेश_!




