लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला

लंका जलने के तीसरे दिन, जब राख अभी गरम थी, विभीषण ने अशोक वाटिका के पीछे वाले गुप्त कक्ष का ताला खोला
यह रावण का निजी पुस्तकालय था। सोने की दीवारें नहीं, ताड़पत्र थे। दस हज़ार से ज़्यादा। उन पर कोई राक्षसी मंत्र नहीं, सामवेद के स्वर, आयुर्वेद के सूत्र, नक्षत्र गणना, और वीणा के आलाप लिखे थे।
एक युवा राक्षस, मेघनाद का बेटा अक्षय नहीं, उसका शिष्य तरणि, ने पूछा, “महाराज विभीषण, सब कहते हैं दशानन अजेय था क्योंकि ब्रह्मा का वरदान था। क्या यही उसकी शक्ति का रहस्य था?”
विभीषण हँसा, पर हँसी में थकान थी। “वरदान कवच देता है, तलवार नहीं। भैया की शक्ति का रहस्य दस सिरों में नहीं था। वह दस सिरों में बँटा हुआ था।”
पहला सिर – सुनने वाला
रावण पैदा पुलस्त्य के कुल में हुआ, पर जन्म से ब्राह्मण था। दस साल की उम्र में उसने अपने पिता विश्रवा से पूछा, “पिताजी, राक्षस क्यों डरते हैं?” विश्रवा ने कहा, “क्योंकि वे सुनते नहीं।”
रावण ने तब पहला तप किया। वह हिमालय गया, कैलाश की छाया में बैठा, और शिव तांडव नहीं, शिव का मौन सुना। सात साल तक उसने सिर्फ सुना। हवा, पानी, यक्षों की फुसफुसाहट, मरते हुए पशुओं की साँस।
जब वह लौटा, तो उसके पास पहला सिर था – श्रोता। वह किसी भी भाषा को एक बार में समझ लेता। देव, दानव, नाग, पशु। इसीलिए वह यम से युद्ध कर सका, क्योंकि यम के भैंसे की थकान की आवाज़ सुन ली थी।
लोगों ने कहा, “रावण को वरदान मिला।” सच यह था कि उसने सुनने की तपस्या की थी।
दूसरा सिर – गाने वाला
दूसरा रहस्य उसकी वीणा थी, रुद्र वीणा। रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए सिर काटे, यह कथा सब जानते हैं। पर वह सिर काटना बलि नहीं था, स्वर था।
हर बार जब वह अपना सिर चढ़ाता, तो नाड़ी से एक नया स्वर निकलता। नौ बार उसने किया। दसवें बार शिव ने हाथ पकड़ लिया। कहा, “बस कर। तूने मृत्यु को संगीत बना दिया।”
उस दिन से रावण के कंठ में वह शक्ति आई कि वह सामवेद को उल्टा गा सके। उल्टा सामवेद मृत्यु को रोकता नहीं, समय को धीमा करता है। इसीलिए लंका में घड़ी धीरे चलती थी। राक्षस सौ साल जवान रहते।
विभीषण ने एक ताड़पत्र उठाया। उस पर राग भैरव उल्टा लिखा था। “भैया इसे रोज़ भोर में गाते थे। कहते थे, शक्ति मारने में नहीं, ठहरने में है।”
तीसरा सिर – गिनने वाला
रावण ज्योतिषी था, पर फलित नहीं, गणित। उसने लंका की नींव उस मुहूर्त में रखी जब शनि वक्री था। सबने कहा अपशकुन। उसने कहा, “वक्री ग्रह पीछे देखता है। जो पीछे देखे, वह गिरता नहीं।”
उसने नवग्रह को बंदी बनाया, यह भी आधा सच है। उसने उन्हें बंदी नहीं, बंधक बनाया। हर ग्रह से एक सूत्र लिया। मंगल से धातु विज्ञान, बुध से भाषा, शुक्र से संजीवनी का अधूरा सूत्र।
उसका दसवाँ सिर यही था – संग्रहकर्ता। वह जानता था कि ज्ञान बाँटने से घटता नहीं, पर रोकने से सड़ता है। उसने रोक लिया। लंका का पुस्तकालय दुनिया का सबसे बड़ा था, पर द्वार बंद था।
चौथा रहस्य – अहंकार नहीं, भय
तरणि ने पूछा, “फिर हारा क्यों?”
विभीषण ने राख पर हाथ फेरा। “क्योंकि उसने दस सिरों को एक साथ कभी नहीं सुना।”
रावण की असली शक्ति एकाग्रता थी। वह एक समय में एक ही सिर से सोचता। युद्ध में वह योद्धा, यज्ञ में ब्राह्मण, दरबार में राजा, वीणा पर कलाकार। पर जब सीता को लाया, तब पहली बार दसों सिर एक साथ बोले।
एक ने कहा, यह अधर्म है। दूसरे ने कहा, यह प्रतिशोध है। तीसरे ने कहा, यह प्रेम है। चौथे ने कहा, यह परीक्षा है। पाँचवें ने कहा, यह नियति है।
वह सुन नहीं पाया। उसने सुनना बंद कर दिया था। जिस दिन उसने श्रोता सिर को चुप कराया, उसी दिन शिव का दिया हुआ स्वर टूट गया।
लोग कहते हैं राम ने नाभि में बाण मारा। नाभि में अमृत था, यह भी कथा है। सच यह है कि नाभि वह जगह है जहाँ से आवाज़ निकलती है। रावण की नाभि में वह पहला स्वर बचा था जो उसने कैलाश पर सुना था। राम ने उसे नहीं मारा, उसे मुक्त किया।
बाण लगते ही रावण हँसा। विभीषण ने देखा था। अंतिम क्षण में दसों सिर एक साथ चुप हो गए, और पहली बार वह पूरा सुन पाया – अपने भीतर का मौन।
उसने राम से कहा, “मुझे ब्राह्मण की तरह अग्नि देना।” वह वरदान नहीं माँग रहा था, वह याद दिला रहा था कि वह कौन था।
रहस्य का अंत
विभीषण ने ताड़पत्र समेटे और कहा, “भैया की शक्ति तप था, संगीत था, गणना थी। पर शक्ति का रहस्य यह नहीं कि तुम कितना इकट्ठा कर लो। रहस्य यह है कि तुम कितना छोड़ सको।”
“उसने देवताओं से अमरता माँगी, ब्रह्मा ने कहा नहीं। उसने मनुष्य और वानर को छोड़ दिया, क्योंकि उसे लगा वे तुच्छ हैं। वही छूट उसे ले डूबी। शक्ति जब चुनती है कि किसे छोटा समझे, तभी वह अंधी हो जाती है।”
तरणि ने पूछा, “तो क्या रावण बुरा था?”
विभीषण ने उत्तर नहीं दिया। उसने वीणा उठाई, जो कोने में रखी थी। एक तार टूटा था। उसने उसे छेड़ा। बेसुरी आवाज़ निकली।
“बुरा नहीं, अधूरा था। दस सिर होने का अर्थ दस बार सोचना नहीं, एक बार दसों को सुनना है। वह कभी नहीं कर पाया।”
बाहर लंका में नई सुबह हो रही थी। राख पर अंकुर फूट रहे थे। विभीषण ने पुस्तकालय का द्वार खोल दिया। पहली बार लंका के बच्चे अंदर आए, ताड़पत्र छुए, स्वर पढ़े।
और तब, कहते हैं, हवा में कहीं दूर से रुद्र वीणा का उल्टा भैरव फिर बजा, पर इस बार धीमा नहीं, मुक्त। जैसे कोई बहुत पुराना श्रोता अंत में अपना ही गीत सुन रहा हो।
संकलनकृता
नवीन उनियाल



